देश की शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा की जरूरत

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देश की शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा देने की जरूरत: नेहरू से लेकर मायावती तक के विजन से सीख
नई दिल्ली –
देश में आए दिन शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर बहस हो रही है। सरकारी स्कूलों की स्थिति, ड्रॉपआउट रेट, और रोजगार के हिसाब से शिक्षा का न होना बड़े मुद्दे बनकर सामने आ रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर देश को आगे ले जाने के लिए शिक्षा का मॉडल कैसा हो?
शिक्षा विशेषज्ञों और आम लोगों का मानना है कि अगर देशवासियों को वाकई शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाना है तो हमें उन नेताओं के विजन से प्रेरणा लेनी होगी जिन्होंने शिक्षा को हमेशा प्राथमिकता दी।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आजादी के बाद IIT, IIM और AIIMS जैसी संस्थाओं की नींव रखी। उनका मानना था कि “विज्ञान और तकनीक” ही नए भारत की रीढ़ बनेंगे।
इंदिरा गांधी के समय में शिक्षा का विस्तार गांव-गांव तक हुआ। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और साक्षरता अभियान पर जोर दिया।
पी.वी. नरसिम्हा राव के कार्यकाल में 1992 की नई शिक्षा नीति आई। उन्होंने आर्थिक उदारीकरण के साथ शिक्षा में गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया।
डॉ. मनमोहन सिंह ने RTE यानी शिक्षा का अधिकार कानून लागू करवाया। उनके समय में उच्च शिक्षा के लिए बजट बढ़ा और स्कॉलरशिप योजनाएं शुरू हुईं।
राज्य स्तर पर भी बड़े नेताओं ने ऐतिहासिक काम किया।
नारायण दत्त तिवारी ने उत्तर प्रदेश में शिक्षा के ढांचे को मजबूत किया।
मुलायम सिंह यादव ने ग्रामीण इलाकों में स्कूल-कॉलेज खुलवाए और बच्चों को शिक्षा से जोड़ा।
मायावती ने फ्री शिक्षा, साइकिल और छात्रवृत्ति जैसी योजनाएं चलाईं, जिससे लाखों बच्चियों को स्कूल जाने का मौका मिला।
नीतीश कुमार ने बिहार में साइकिल योजना, पोशाक योजना और बालिका प्रोत्साहन से साक्षरता दर 47% से 70% के पार पहुंचाई।
ज्योति बसु ने पश्चिम बंगाल में 34 साल तक प्राथमिक शिक्षा को मजबूत किया और साक्षरता अभियान को गांव-गांव तक पहुंचाया।
शीला दीक्षित ने दिल्ली के सरकारी स्कूलों का कायाकल्प किया। क्लासरूम, लैब और शिक्षक ट्रेनिंग से दिल्ली के स्कूलों का रिजल्ट प्राइवेट के बराबर हुआ।
नवीन पटनायक ने ओडिशा में आदिवासी और दूरदराज इलाकों में आवासीय स्कूल और मिड-डे मील को बेहतर बनाकर शिक्षा को सुलभ किया।
इन सभी नेताओं की एक सोच कॉमन थी – शिक्षा सर्वोपरि है ।
आज देश को फिर से उसी सोच की जरूरत है। जहां शिक्षा राजनीति से ऊपर हो, बजट समय पर आए, शिक्षकों की ट्रेनिंग हो, और गांव का बच्चा भी IIT-JEE का सपना देख सके।
अगर हम नेहरू, इंदिरा , राव , मनमोहन , तिवारी , मुलायम , मायावती , नीतीश , बसु , दीक्षित,पटनायक का समावेश – इन सबको मिलाकर एक नई शिक्षा नीति बनाएं, तो भारत वाकई “विश्वगुरु” बन सकता है।
सबसे जरूरी बात ये है कि देश को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है। ऐसे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री चाहिए जो शिक्षा को सिर्फ भाषण का मुद्दा न बनाएं, बल्कि बजट, नीति और जमीन पर अमल में प्राथमिकता दें। जब शीर्ष पर बैठे नेता खुद शिक्षा को मिशन मानेंगे, तभी स्कूल की चौखट से लेकर यूनिवर्सिटी की लैब तक गुणवत्ता पहुंचेगी।
शिक्षा में निवेश ही असली विकास है। देश को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो हर बच्चे तक रोशनी पहुंचाए।

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